Saturday, 15 February 2014

नज़्म _ तुम्हारी याद



कहाँ है  नींद आँखों में 
पटकती सर उदासी है
सितम की खाक़ से लिपटी 
थकन है बदहवासी  है

मेरे आँसू भिगोते  है 
मेरा तकिया मेरा बिस्तर
चले ये नब्ज़ भी मद्दम 
तवाज़ुन में नहीं धड़कन
तुम्हारे बाद से अब तक 
तो  मेरा हाल है बद्दतर 

नहीं जो साथ तू मेरे 
मुझे हर पल लगे सदियां 
बड़ी मुश्किल से कटती है 
उदासी में मेरी घड़िया 

मैं  इतनी क्यूँ परेशां हूँ 
 हुई है भूल ये कैसी 
 जमी है आईने पे
 
कब से मेरे धूल ये कैसी


समझ में ये नहीं आता 
नहीं जिससे कोई नाता 
वो क्यूँ कर याद आता है 
वहीं क्यूँ दिल को भाता है 


मैं बेख़ुद सी ही रहती हूँ मुझे कुछ होश आने दो उसे मत याद आने दो ख़ुदाया भूल जाने दो




siya

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