Saturday, 14 September 2013

कहूं भी कैसे ग़ज़ल दानिश ए निसाब नहीं

है मेरे शेर में अब भी वोह आब ओ ताब नहीं
कहूं भी कैसे ग़ज़ल दानिश ए निसाब नहीं 

ग़म ए जहान का रक्खा कोई  हिसाब नहीं 
मिले हैं खार ही, हर शाख पर गुलाब नहीं 

कोई बताए के सम्भलूँ  तो किस तरह सम्भलूँ 
मिली हैं ठोकरें इतनी की कुछ हिसाब नहीं 

हिजाब में है हर इक राज़ मेरी हस्ती का 
जिसे वो शौक से पढ़ मैं वो किताब नहीं 

ये  बेरुख़ी,ये अज़ीयत उतर गई दिल में 
तुम्हारे ज़ुल्म का सच है  कोई हिसाब नहीं 

सिया सुकून से बाक़ी जो है  गुज़र जाए 
अब और रंज सहूँ इतनी मुझ में ताब नहीं 

Hai mere she'r mein ab bhi woh aab o taab nahi'N kahoon bhi kaise ghazal daanishe nisab nahi'N

gham-e-jahan ka rakkha koi hisab nahee'N
miley hain khar hee, har shaakh per gulaab nahi'N


koi bataaye ke sambhlooN to kis tarah sambhlooN
mili hai'n thokre'N itni ki kuch hisaab nahi'N
 Hijaab mei hai har eik raaz meri hasti ka
jise wo shouq se padh le main wo kitab nahee'N

Yeh berukhi, yeh azeeyat utar gai dil mei
 tumahare zulm ka sach hai  koi  hisaab nahee'N

siya sukoon se baki hai guzar jaaye 
Ab aur ranj sahooN itni mujh men taab nahi'N

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार - 16/09/2013 को
    कानून और दंड - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः19 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  2. बेह्तरीन अभिव्यक्ति बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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