Wednesday, 19 September 2012

हिन्दी दिवस पर विशेष....एक नज़्म


गुरुनानक गुरुगोबिंद की भाषा हिंदी 
भारतीयों के लिए है नयी आशा हिंदी 

मेरा अभिमान है पहचान है भाषा हिंदी
सभ्यता है ये मेरी जान है भाषा हिंदी 

बाल्मीकि के गुलिस्तान की कली है हिंदी 
तुलसी और सूर के आँगन में पली है हिंदी 

अपने दोहों को कहा करते थे हिंदी में कबीर
जिन की हर बात हुआ करती थी पत्थर की लकीर

पन्त की और निराला की अभिलाषा थी
भारतेंदु के लिए मान थी मर्यादा थी

डूबा रहता था सदा मीरा का मन हिंदी में
विरह की मारी वो लिखती थी भजन हिंदी में

हिंदी भाषा की लगन रखते थे दिल में फ़नकार
खानकाहा ही नहीं खुसरों भी हिंदी पे निसार

कितने दिन बीत गए आज भी बाकी है सरूर
गीत तो तुमने भी नीरज के सुने होंगे जरुर

गीत बैरागी ने हिंदी में सुनाया है हमें
इसी भाषा में तो काका ने हंसाया है हमें

याद आती है वो हिंदी की सभी कविताये
किस तरह भूलेगे बच्चन की सभी रचनाये

अपनी भाषा से बनाये रक्खो तुम अपना लगाव
छोड़ कर दूसरी भाषाओ को हिंदी अपनाओ

इसका सम्मान करो दिल से लगाओ इसको
जितना भी हो सके आदर्श बनाओ इसको

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