Friday, 17 August 2012

मैं समझती हूँ खूब क्या हूँ मैं


देख लो मुझको आइना हूँ मैं 
होठ सी कर भी बोलता हूँ मैं 

आईने में नहीं हूँ मैं मौजूद
अस्ल क़िरदार से जुदा हूँ मैं 

हादसे क्या बुझायेगे मुझको 
एक उम्मीद का दिया हूँ मैं 

सच तो ये हैं की इस कहानी में 
इब्तिदा तू हैं इन्तेहाँ हूँ मैं 

सब मुझे ढूढने से है क़ासिर 
इक अजब शहरे_गुमशुदा हूँ मैं 

राह मंज़िल की जो दिखाता है 
उस मुसाफ़िर का नक्शे_प़ा हूँ मैं 

लोग कुछ भी कहे 'सिया' लेकिन 
मैं समझती हूँ खूब क्या हूँ मैं 

dekh le mujhko aaina hoon main 
hoth see kar bhi bolta hoon main 

aaine mein nahi hoon main mojood 
asl kirdaar se juda hoon main 

hadse kya bhujayege mujhko 
ek umeed ka diya hoon main 

sach to yeh hai ke is kahani mein 
ibteda too hai intehaan  hoon main 

sab mujhe dhudhne se hai qasir 
ik ajab shahre gumshuda hoon main 

raah manzil ki jo dikhata hai
us musafir ka nakshe _paa hoon main 

log kuch bhi kahe siya lekin
main samjhti hoon khoob kya hoon main ..................

No comments:

Post a Comment