Saturday, 7 April 2012

शोला निकल गया कभी शबनम निकल गया

हसरत निकल न पाई मगर दम निकल गया 
अच्छा हुआ ये ज़िन्दगी का ग़म निकल गया

लफ़्ज़ों में अब तो आपके 'मैं का मक़ाम है
गुफ्तार से वो प्यार भरा हम निकल गया

ए इश्क तेरी सम्त नज़र जब कभी पड़ी
दिल से हमारे शुबहा -ए -पैहम निकल गया

खुद हम उलझ के रह गए ए जान ए शायरी
ग़ज़लों से हमने माना हर इक ख़म निकल गया

मुद्दत के बाद जाके हमें आया अब करार
जो कर रहा था दीदा _ए _पुरनम,निकल गया

बस मैं ही जानती हूँ मेरी आँख का मिज़ाज
शोला निकल गया कभी शबनम निकल गया

मैं शायरी के दम से ही जिंदा हूँ ए सिया
ग़र ये न हो तो समझो मेरा दम निकल गया

1 comment:

  1. बस मैं ही जानती हूँ मेरी आँख का मिज़ाज
    शोला निकल गया कभी शबनम निकल गया

    siya...kya khoob kaha hai...bas bahut khoob

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