Monday, 30 April 2012

रहबरी के लिए वो नूरे ख़ुदा है मुझ में


इस तरह ज़ज्ब हुआ है मेरा साया मुझ में 
ऐसा लगता है की कुछ ढूढ़ रहा है मुझ में 

मैंने हर हाल में जीने का हुनर सीखा है 
रहबरी के लिए वो नूरे ख़ुदा है मुझ में 

वक़्त की धूप ने मुरझा के रख दिया हैं उसे 
फूल उम्मीद का जिस वक़्त खिला है मुझ में

शोर  इतना है की सुन पाई ही नहीं अब तक 
एक  मुद्दत से कोई नग्मासरा है मुझ में 

राह की धूप भी लगने लगी ठंडी ठंडी 
छावं बन के वो कहीं आन बसा है मुझ में 

मेरे अशआर मेरा राज़ अयाँ कर देगे 
कब से इक प्यार का तूफ़ान छुपा है मुझ में 

मेरा बस चलता है ख्वाबों पे न यादों पे सिया 
इक मज़बूर सा इन्सां छुपा है मुझ में 

1 comment:

  1. राह की धूप भी लगने लगी ठंडी ठंडी
    छावं बन के वो कहीं आन बसा है मुझ में

    sach kaha hi... jab kisi pyare ka saath milta hai to tamam dushvariyan bhi inayaten lagne lagti hai.
    bahut sundar likha hai Siya Congrets...

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