Saturday, 7 April 2012

किसी रोते हुए को ग़र हँसा दे सबब मिल जायेगा सच्ची ख़ुशी का


कहाँ दम टूटे जाये  आदमी का 
भरोसा क्या हैं तेरी ज़िन्दगी का  

जरुरत को अगर अपनी घटा ले 
समय कट जायेगा फिर मुफलिसी का 

 ग़मे दुनिया में क्यूं उलझी हुई है 
सकूं पायेगी सज़दा कर उसी का 

किसी रोते हुए को ग़र हँसा दे 
सबब मिल जायेगा सच्ची ख़ुशी का 

फ़क़त मुझको सहारा है ख़ुदा का 
सिला मिलता हैं सच्ची बंदगी का 

यकीं तो  बस ख़ुदा की जात का है 
ज़माने में कहाँ कोई किसी का 

ज़माना कब समझ पाया सिया को 
मिज़ाज अपना रहा है सादगी का 

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