Saturday, 7 April 2012

दर्द आँखों ने कह दिया दिल का


कितना उलझा है फैसला दिल का
 कैसे सुलझे मुआमला दिल का 

मेरी सुनता नहीं कभी पागल 
क्या खबर अब हो हाल क्या दिल का

 अपना ही घर है तुम चले आओ
मैं ने रख्खा है दर खुला दिल का।

 इश्क़ में बेकली ही मिलती है
हाल और होगा क्या भला दिल का

लब तो ख़ामोश  ही रहे लेकिन
हाल आँखों ने कह दिया दिल का

 चोट खाए मुझे ज़माना हुआ
ज़ख्म है आज तक हरा दिल का

खुद डुबो दूँ कहीं न मैं किश्ती 
ऐसा टूटा है हौसला दिल का

 गुम हुआ है कहाँ खुदा जाने 
मुझको मिलता नहीं पता दिल का

 जा! भुलाया तुझे सिया मैं ने
 भूल! तू भी कहा,सुना दिल का....

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