Tuesday, 20 December 2011

सभी ने जुबां पर लगाए हैं ताले .

यही कह रहे हैं सभी अज्म वाले 
मुझे आजमा ले मुझे आजमा ले .

यहाँ सच का जैसे रिवाज उठ गया है
सभी ने जुबां पर लगाए हैं ताले .

न मंदिर से निस्बत न मस्जिद से रिश्ता
जले घर मैं चूल्हा , मिलें दो निवाले .

भरोसा है या रब तिरी रहमतों का
ये जीवन की कश्ती है तेरे हवाले .

पडोसी है भूखा ये सोचा नहीं है
तो किस काम के हैं ये मस्जिद शिवाले .

किसी माँ का दिल कैसे ये सह सकेगा
कि बच्चों का घर और खाने के लाले .

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