Tuesday, 20 December 2011

चाहने वाले ज़माने में कहाँ मिलते हैं

ढूंढिए लाख मगर दोस्त कहाँ मिलते हैं 
जिस तरफ जाइए बस दुश्मन ए जां मिलते हैं 

मेरे एहसास मेरे दिल को जवां मिलते हैं 
मुस्कुराते हुए मिलते हैं जहाँ मिलते हैं 

जुस्तजूं रहती हैं खुद को भी हमारी अपनी
खो गए हम तो किसी को भी कहाँ मिलते हैं

उन से कह दीजे मेरे प्यार की कुछ कद्र करें
चाहने वाले ज़माने में कहाँ मिलते हैं

आज तो छावं में बैठी हूँ अपने आँगन में
वक़्त की धूप के क़दमों के निशाँ मिलते हैं

गुफ़्तगू का ना सलीका है ना आदाब कोई
आज के दौर में क्या एहले _जबां मिलते हैं

जां लुटा देने की जो करते हैं बाते अक्सर
वक़्त पड़ जाये तो वो लोग कहाँ मिलते हैं

मेरी खुद्दार तबीयत को गवारा ही नहीं
वहाँ चलना जहां क़दमों के निशाँ मिलते हैं .

पहले अश'आर सिखा देते थे जीने की कला -
आजकल ऐसे खयालात कहाँ मिलते हैं

ढलते सूरज को जो देखूं तो ख्याल आता है
उम्र ढलने के भी चेहरे पे निशाँ मिलते हैं

चंद चेहरे जो चमकते है बहुत महफ़िल में
उनको तन्हाई में देखो तो धुवां मिलते हैं

सिल गए होंठ मेरे ज़ख्म सिलें या ना सिलें
इश्क वालों को सिया दर्द यहाँ मिलते हैं

siya

2 comments:

  1. मेरी खुद्दार तबीयत को गवारा ही नहीं
    वहाँ चलना जहां क़दमों के निशाँ मिलते हैं .
    लाजवाब सिया जी...
    बहुत खूब.

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  2. चंद चेहरे जो चमकते है बहुत महफ़िल में
    उनको तन्हाई में देखो तो धुवां मिलते हैं

    wah ji wah

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