Wednesday, 14 September 2011

आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है

क्यों वह ताक़त के नशे में चूर है
आदमी क्यों इस क़दर मग़रूर है।

गुलसितां जिस में था रंगो नूर कल
आज क्यों बेरुंग है बेनूर है।

मेरे अपनों का करम है क्या कहूं
यह जो दिल में इक बड़ा नासूर है।

जानकर खाता है उल्फ़त में फरेब
दिल के आगे आदमी मजबूर है।

उसको "मजनूँ" की नज़र से देखिये
यूँ लगेगा जैसे "लैला" हूर है।

आप मेरी हर ख़ुशी ले लीजिये
मुझ को हर ग़म आप का मंज़ूर है।

जुर्म यह था मैं ने सच बोला "सिया"
आज हर अपना ही मुझ से दूर है।

1 comment:

  1. Siya mam sahiba ji waah behad khubsurat gazal ki pes kas apki शब्दोँ के खजानेँ की बेशकिमती मोती आपकी वाकेइ बेहीसाव हैँ ! बहोत उम्दा ! Siya mam sahiba ji waah behad khubsurat gazal ki pes kas apki शब्दोँ के खजानेँ की बेशकिमती मोती आपकी वाकेइ बेहीसाव हैँ ! बहोत उम्दा !

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