Thursday, 25 August 2011

इक दिन याद आएगी तुम्हे कीमत हमारी

दिलों से खेलना ठहरी जो आदत तुम्हारी
यकीन करना सभी पर ये फितरत हमारी

खिलौना जान कर दिल को ठोकर मारते है
लगे तुमको भी ठोकर इक दिन हसरत हमारी

खुदा के घर में है इन्साफ इतना याद कर लो
की इक दिन याद आएगी तुम्हे कीमत हमारी

ना पाओगे दुबारा इतना तुमने दिल दुखाया
मुझे भी दूर ले जाएगी ये नफरत तुम्हारी

हमें रुसवाई का डर है तुम्हे ना फर्क कोई
सिया के संग जाएगी ये हकीकत तुम्हारी

2 comments:

  1. आदरनिया सिया जी आपका शब्दों का चयन ला जवाब हें
    में आज मैरे ऑफिस में किसी के साथ लंच पर इंतजार कर रहा था की आप फेसबुक पर मिल गए
    आपतो कमाल हों यार ,
    आपके शब्दों का चयन उसको बंधने क अभिव्यक्ति और अंदाज वाकई तारीफे काबिल हें
    मजा आगये आप्जेसे पवित्र विचारो वाली लेडी से मिल कर
    भगवान आपको, आपकी लेखनी, और काबिलियत को हमेशा बरक़रार रखे
    हमेशा आपकी तरक्की सही मूल्यों के साथ होती रहे
    सदेव आपकी सद्भावनाओ के साथ समर्पित
    नवीन सी दुबे

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  2. सादर समर्पित माँ एक एहसास ,माँ एक दुआ , माँ की याद जैसे जीवन पूरा हुआ ....वो किलकारियों पे खुश होती थी ,वो हमारे गिरने पे रोती थी ...दुलार प्यार ओर ममता का वो भाव हर गलती पे किया हमारा बचाव वो मुहँ का निवाला हमें खिलाती थी खुद जाग कर हमें सुलाती थी माँ की सीख हमेशा याद आती हें उनकी याद मे आंखे नम हो जाती हें
    नवीन सी दुबे द्वारा दिनांक ५नवम्बर २०१० को लिखी गयी

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