Friday, 15 July 2011

क्या ज़माने का हाल है देखो

ग़म से दिल फट रहा है सीने में
क्या ज़माने का हाल है देखो


बेरहम कितना हो गया इंसा
ये ज़मीन ख़ू से लाल है देखो

इसके दिल में खुदा का खौफ नहीं

ना ही कोई मलाल है देखो


ये हैं इंसा या ये पत्थर है
शर्म है ना ख्याल है देखो


ज़ुल्म ढाता हैं बेगुनाहों पर
सबका जीना मुहाल है देखो


siya

1 comment:

  1. सिया जी,
    "ये हैं इंसा या ये पत्थर है
    शर्म है ना ख्याल है देखो "
    बहुत सत्य पूर्ण, आदमी अब आदमी नहीं जानवर से भी बदतर है!
    ----------------------ऐसे ही लिखती रहिये!

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