Sunday, 10 July 2011

मेरे सर पे माँ का हाथ

सीख हुनर चेहरा पढने का
नज़र से जानो दिल की बात


काबिल तो वो कहलाता है
जिसने ना खायी हो मात


नेक कर्म होते है जिसके
उसकी ही है ऊँची जात


चाह नहीं दौलत शोहरत की
बस मांगे अपनों का साथ


कड़ी धूप में छावं की जैसे
मेरे सर पे माँ का हाथ


सुख दुःख आते जाते रहते
दिन आएगा बीते रात

siya

2 comments:

  1. क्या कहना, बहुत सुंदर

    मां मेरे गुनाहो को कुछ इस तरह से धो देती है,
    जब वो बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।।

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  2. कड़ी धूप में छावं की जैसे
    मेरे सर पे माँ का हाथ
    bahut sunder, Maa aisi hi hoti hai ......badhai

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