Thursday, 23 June 2011

गुंचा -ए_ दिल जो खिलाओ तो रास्ता निकले


वफ़ा की शम्मा जलाओ तो रास्ता निकले
यकीन चाहत का दिलाओ तो रास्ता निकले

तू चाँद हैं,जो अँधेरी रात को रोशन कर दे
मेरे दिल में उतर आओ तो रास्ता निकले

गीत जो मैं लिखूं वो हो तुम्हारे लिए
तुम उसी गीत को गाओ तो रास्ता निकले

मुझको महसूस तो होती है तुम्हारी धड़कन
हया के परदे गिराओ तो रास्ता निकले

हाले_ए _दिल अपना जुबा पे क्यों नहीं लाते
ये तकल्लुफ जो मिटाओ तो रास्ता निकले

मैं तेरे हिज्र में बरसों से मुन्तज़िर आख़िर
गुंचा -ए_ दिल जो खिलाओ तो रास्ता निकले

सिया

1 comment:

  1. मैं तेरे हिज्र में बरसों से मुन्तज़िर आख़िर
    गुंचा -ए_ दिल जो खिलाओ तो रास्ता निकले

    kya baat hai siya ji dil jeet liya aapne......
    sunder sabdo se rachi aapki ye rachna .badhai

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