Thursday, 2 June 2011

फुटपाथों पर जिनको सोते देखा है

चुपके चुपके उनको रोते देखा है
फुटपाथों पर जिनको सोते देखा है

जीती बाज़ी हार ही जाता है मुफ़लिस
खेल ये अक्सर हमने होते देखा है

उनके हिस्से नफरत अक्सर आई है
फ़स्ल वफ़ा की जिनको बोते देखा है

क़िस्मत के दर न खुलने थे न खुल पाए
अश्क से दामन खूब भिगोते देखा है

लोगों का वो सिर्फ लहू ही पीते हैं
पाप जिन्हें गंगा में धोते देखा है

siya...

2 comments:

  1. "कितनी अनमोल रचना है, सच्चाई का दर्पण ही कहूँ, धन्यवाद! आपके साहित्य को सलाम!"

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  2. चुपके चुपके उनको रोते देखा है
    फुटपाथों पर जिनको सोते देखा है

    जीती बाज़ी हार ही जाता है मुफ़लिस
    खेल ये अक्सर हमने होते देखा है

    bahut achchi ghazal jivan ki ek nayi seekh deti aapki ghazal dil ko chu rahi hai mai bhi ek ek ghazal padh kar aapki ghazlo me dub raha hoon aabhaar dhanyawaad meri aapki ghazlo se dosti hui

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