Tuesday, 24 May 2011

तंज मुझपे कस रहे हैं

हम हैं आख़िर अश्क ही तो पी रहे हैं.
भूलकर इस ज़िन्दगी को जी रहे हैं

आज तन्हाई मिली है दोस्तों 
ज़ख़्म हैं चुपचाप उनको सी रहे हैं.

देखकर दुनिया की हालात फख्र है
हम कभी इंसान भी असली रहे हैं

आपको इस बात का भी इल्म है
हम कभी चादर नहीं मैली रहे हैं 


3 comments:

  1. "हम हैं आख़िर अश्क ही तो पी रहे हैं.
    भूलकर इस ज़िन्दगी को जी रहे हैं"...
    सही बात

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  2. jeevan nahi hai zindgi me fir bhi jiye ja raha hoo
    rookti nahi hai saanse so liye ja raha hoo

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