Friday, 10 January 2014

सिर्फ कहने के लिए ज़िंदा हूँ


ज़िंदगी तुझसे मैं शर्मिंदा हूँ सिर्फ कहने के लिए ज़िंदा हूँ
आज भी करती हूँ यक़ीं सब पर जाने किस दौर की बाशिंदा हूँ
घर के आँगन की बात बाहर की आज इस बात पे शर्मिँदा हूँ
रास जिसको न उड़ना आया हो मैं क़फ़स का वहीं परिंदा हूँ
ख़ुद पे हैरत सी हो रही है सिया खा के इतने फ़रेब ज़िंदा हूँ

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