Thursday, 22 August 2013

जब चरागों को नींद आती है

मुफ़लिसी जब सुकून पाती है 
 मुस्तक़िल गीत गुनगुनाती है 

भूख की आग जब सताती है 
सब उसूलों को लील जाती है

खौफ़ से रात थरथराती है 
जब चरागों को नींद आती है 

फूँक कर ज़ुल्मतों के पैराहन 
रौशनी भी धुँवा उड़ाती है 

चाँद के जिस्म में छिपी बुढ़िया 
रास्तों में दिए जलाती है 

हार के बैठ मत सिया जाना 
तेरी मंजिल तुझे बुलाती है 

 

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार, 23/08/2013 को
    जनभाषा हिंदी बने.- हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः4 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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