Thursday, 1 August 2013

इक ज़ख्म भर गया तो,नया दे गया कोई

मुझको मेरी वफ़ा का सिला  दे गया कोई 
इक ज़ख्म भर गया तो,नया दे गया कोई 

मायूसियों की ज़द में थी कब से हयात ये 
आँखों में मेरे ख्वाब नए दे गया कोई 

दर दर भटक रही थी मैं खाना बदोश सी 
आँखों को मेरे ख़्वाब नया दे गया कोई 

अब तक तो बेसबब ही जिए जा रही थी मैं 
जीने की ये नई सी अदा दे गया कोई 

जलता था तेज़ धूप में कब से मेरा वजूद 
सावन की मुझको ऐसी घटा दे गया कोई 

इज़हार ज़ख्म ए दिल तो नहीं कर सके कभी 
खामोशियों की मुझको सजा दे गया कोई 

किस्मत से तुझको अपनी शिकायत न हो कभी 
दुनिया के सुख मिले ये दुआ दे गया कोई 

हमको वफ़ा परस्ती का इनाम ये मिला 
दिल के करीब आके दगा दे गया कोई 
Mujhko meri wafa ka sila de gya koi ik zakhm bhr gya to,naya de gya koi...

Mayoosiyo'n ki zad me thi kab se hayat ye
Aankho mei mere khwaab naya de gya koi

Dar dar bhatak rahi thi mai khana badodh si 
shafqat ki mere sar pe rida de gaya koi

ab tak to besabab hee  jiye ja rahe the hum 
jeene ki ye nayi si ada de gaya koi 

Jalta tha tez dhoop mein  kab se mira wajood
sawan ki mujh ko aisi ghata de gaya koi 
Izhaar zakhm-e-dil ka nahi'n kar saki kabhi".
khamoshiyo ki mujhko saza de gaya koi 

kismat se tujhko apni shikayat na ho kabhi 
duniya ke sukh mile ye dua de gaya koi

Humko wafa parasti ka in'aam ye mila 
dil ke qareeb aake daga de gaya koi

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