Wednesday, 8 February 2012

रहमत


इस ग़ज़ल में पयाम उसका है
नाम उसका सलाम उसका है

उसकी रहमत है ज़िन्दगी मेरी
मेरे लब पे कलाम उसका हैं

मुझको है आसरा फ़क़त उसका
इश्क में सारा काम उसका है

हम फ़क़त आसमाँ को तकते हैं
सबसे ऊँचा तो बाम उसका है

जिसको पीकर सुरूर छा जाए
बंदगी का वो जाम उसका है

दैरो -काबा-ओ- मथुरा काशी में
हर जगह सिर्फ नाम उसका है

हमको लेना ही क्या ज़माने से
ज़िक्र बस सुबहो- शाम उसका है

हम तो कठपुतलिया है बस उसकी
बाकी सारा ही काम उसका है

बस इशारे पे रब के चलती जा
कितना बेहतर निजाम उसका है

एक मेला है ज़िन्दगानी भी
जिसमे हर इंतजाम उसका है

हम हैं मेहमान कुछ दिनों के फ़क़त
ये सभी ताम झाम उसका है

मेरा मिटटी के जैसा मोल 'सिया'
जो अता हो न दाम उसका है

No comments:

Post a Comment