Saturday, 4 June 2011

वक़्त कम सा है

क्यों इतना बेखबर होकर मेरे बाजू से गुजरा है
तुम्हारी इक नज़र खातिर ये दिल बरसो से तरसा है

बरसता हैं जो कतरा नहीं पानी की हैं बूंदे हैं
ये आंसू हैं जो मेरी इन्ही आँखों से बरसा है

नब्ज़ जाती है अब छु टी तेरे दीदारे _ हसरत में
आखरी शब् है जुदाई का यहीं दिल में गम सा है

आ तुझको देख लू जी भर फिर मुझको करार आये
की तुझपे जान लुटा दे जो न कोई ऐसा हम सा है

आखरी दम ये मेरा पनाहों में तेरी निकले
सनम अब आ भी जाओ पास मेरे वक़्त कम सा है

siya...

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